
CG Mirror News
रायपुर: छत्तीसगढ़ वन विभाग में ठेका पद्धति लागू करने की कवायद और फ्रंट लाइन स्टाफ (वर्दीधारी बल) के लिए बनाई जा रही नई विभागीय स्थानांतरण नीति को लेकर विवाद गहरा गया है। छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ ने इसे प्रदेश के मूल निवासियों, आदिवासियों और मैदानी कर्मचारियों के हितों पर सीधा कुठाराघात करार देते हुए कड़ा आक्रोश जताया है।
‘वनवासियों के पेट पर लात और बाहरी ठेकेदारों को फायदा’
संघ के प्रांताध्यक्ष अजीत दुबे ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ जैसे वन-प्रधान राज्य में लाखों ग्रामीणों और आदिवासियों की रोजी-रोटी वृक्षारोपण, नर्सरी प्रबंधन, कूप कटाई और जल संरक्षण जैसे कार्यों से चलती है। यदि विभाग में ठेका प्रथा लागू की गई, तो ठेकेदार अपने मुनाफे के लिए बाहरी मजदूरों और मशीनों का इस्तेमाल करेंगे। इससे सदियों से जंगलों की रक्षा करने वाले स्थानीय वनवासी बेरोजगार होकर भुखमरी और पलायन की कगार पर पहुँच जाएंगे। साथ ही जंगलों की अवैध कटाई और वन्यजीवों पर खतरा बढ़ने की आशंका है।
विवादास्पद ट्रांसफर नीति पर भी भारी नाराजगी
श्री दुबे ने कहा कि फ्रंट लाइन स्टाफ की पदस्थापना और स्थानांतरण को लेकर वर्ष 2019 में शासन स्तर पर स्पष्ट निर्देश दिए जा चुके थे। इसके बावजूद पुरानी व्यवस्थाओं और आदेशों को दरकिनार कर कर्मचारियों के विरुद्ध विसंगतिपूर्ण नीतियां थोपी जा रही हैं, जिससे विभाग के वर्दीधारी मैदानी अमले में भारी असंतोष है।
फैसले वापस नहीं हुए तो पूरे प्रदेश में ठप होगा काम
संघ ने वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एवं वन बल प्रमुख के इन फैसलों को ग्रामीण-विरोधी, वन-विरोधी और कर्मचारी-विरोधी बताया है। संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि ठेका पद्धति के प्रयासों को तत्काल वापस नहीं लिया गया और विसंगतिपूर्ण स्थानांतरण नीति पर रोक नहीं लगी, तो प्रदेशभर के वन कर्मचारी पूर्ण कार्य बहिष्कार पर चले जाएंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
Views: 0




