
रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) को लेकर तैयारियां जारी हैं। प्रदेश सरकार ने प्रस्तावित UCC का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति गठित की है। इसी बीच UCC को लेकर जनजातीय समाज के बीच चल रही चर्चाओं, विरोध और विभिन्न संगठनों की ओर से जताई जा रही आशंकाओं को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
राज्य सरकार की ओर से पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि अनुसूचित जनजाति समुदायों को प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखा जाएगा। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा भी इस संबंध में अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि जनजातीय समाज का जीवन उनकी पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्थाओं पर आधारित है, इसलिए उन्हें UCC से अलग रखा जाएगा।
इसके बावजूद प्रदेश के कुछ जनजातीय संगठनों की ओर से UCC को लेकर चिंता और विरोध जताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब सरकार अनुसूचित जनजातियों को प्रस्तावित कानून से बाहर रखने का आश्वासन दे चुकी है, तो फिर जनजातीय समाज के बीच UCC को लेकर भय और आशंकाओं का माहौल क्यों बन रहा है?
हालांकि, जनजातीय प्रतिनिधियों की ओर से समिति के समक्ष अपनी पारंपरिक व्यवस्थाओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग भी रखी गई है। ऐसे में सरकार के आश्वासन को स्पष्ट कानूनी प्रावधानों में शामिल करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अभी लागू नहीं हुआ है UCC, समिति कर रही सुझावों का परीक्षण
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में अभी समान नागरिक संहिता लागू नहीं हुई है। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में बैठकें आयोजित कर आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और विभिन्न समुदायों से सुझाव एवं आपत्तियां प्राप्त कर रही है।
30 अक्टूबर 2026 तक सुझाव और आपत्तियां प्रस्तुत करने की समय-सीमा निर्धारित की गई थी। समिति को एक हजार से अधिक सुझाव प्राप्त होने की जानकारी सामने आई है। अब समिति इन सुझावों और विभिन्न राज्यों में लागू कानूनों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट तैयार कर रही है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार समिति 30 नवंबर तक राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इसके बाद दिसंबर में विधानसभा के शीतकालीन सत्र में UCC से संबंधित मसौदा या विधेयक पेश किए जाने की तैयारी है।
जनजातीय समाज के वास्तविक मुद्दों पर भी होनी चाहिए चर्चा
जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण विषय है। किसी भी कानून को लेकर समाज के बीच आशंकाएं हैं तो उनका समाधान तथ्यों और स्पष्ट कानूनी प्रावधानों के माध्यम से किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी सरकारी नीति का विरोध करना सभी का अधिकार है, लेकिन विरोध के दौरान तथ्यों को सही तरीके से सामने रखना भी उतना ही जरूरी है।
ऐसे में जनजातीय समाज के बीच UCC को लेकर अनावश्यक भय और भ्रम फैलाने के आरोपों की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। साथ ही समाज के शिक्षित और जागरूक लोगों को इस विषय पर तथ्यों के आधार पर संवाद आगे बढ़ाना चाहिए।
जनजातीय समाज के सामने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आर्थिक सशक्तीकरण, सड़क, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। इन विषयों पर भी उतनी ही गंभीरता से आवाज उठाने की आवश्यकता है।
अब निगाहें समिति की रिपोर्ट पर
फिलहाल प्रदेश में UCC को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। समिति की रिपोर्ट और सरकार द्वारा तैयार किए जाने वाले अंतिम मसौदे से ही यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित कानून का स्वरूप क्या होगा और विभिन्न समुदायों के अधिकारों एवं परंपराओं की सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान किए जाएंगे। ऐसे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले समिति की रिपोर्ट और सरकार के अंतिम निर्णय का इंतजार करना जरूरी है।
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