
विकास के नाम पर विनाश ! देखरेख के अभाव से धौरासांड में पंचायत और PDS भवन बने खंडहर, CCTV कबाड़ में, गाँव की सरकार खुद बेहाल।
CG Mirror News
फरसाबहार जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत धौरासांड में विकास की सच्चाई बेहद डरावनी और शर्मनाक तस्वीर पेश कर रही है। जिस पंचायत भवन में बैठकर गाँव के विकास की योजनाएँ बननी चाहिए थीं, वही भवन आज खुद अपनी बदहाली की कहानी बयान कर रहा है। भवन की दीवारों में गहरी दरारें, जगह-जगह बड़े-बड़े छेद और टूटता हुआ प्लास्टर कभी भी किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। स्थिति इतनी खराब है कि पंचायत भवन अब प्रशासनिक केंद्र कम और खंडहर ज्यादा नजर आता है।
हैरानी की बात यह है कि लाखों रुपये के CCTV कैमरे, कंप्यूटर और अन्य सरकारी उपकरण इस्तेमाल होने की बजाय कबाड़ में पड़े धूल खा रहे हैं। जनता के टैक्स के पैसों से खरीदे गए संसाधन यूँ बर्बाद होना सिस्टम की खुली लापरवाही को उजागर करता है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पंचायत भवन को चावल गोदाम और कबाड़खाना बना दिया गया है। जहाँ ग्रामसभा होनी चाहिए, वहाँ आज राशन के बोरे और टूटे सामान भरे पड़े हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि, जगह की कमी के चलते पंचायत भवन का उपयोग स्टोरेज के रूप में किया जा रहा है।
ग्राम सरपंच श्रीमती दशमति पैकरा का कहना है कि फिलहाल बजट का अभाव है, बजट आने पर मरम्मत कराई जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि जब सालों से बजट नहीं मिला, तो जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक इस गंभीर स्थिति पर संज्ञान क्यों नहीं लिया ? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है
इतना ही नहीं, ग्राम धौरासांड की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का भवन भी पूरी तरह कबाड़ में तब्दील हो चुका है।
जहाँ से गरीबों को अनाज मिलना चाहिए, वहाँ टूटे शटर, उखड़ी खिड़कियाँ और जर्जर दीवारें खतरे की घंटी बजा रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि भवन कभी भी गिर सकता है, ग्रामीणों ने कई बार जनपद और ब्लॉक कार्यालय में शिकायत की, लेकिन आज तक न निरीक्षण हुआ और न कोई ठोस कार्रवाई।
नतीजा यह है कि धौरासांड में सरकारी संपत्तियाँ एक-एक कर कबाड़ में बदलती जा रही हैं और जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ कागजों में विकास दिखा रहे हैं। यह सिर्फ एक गाँव की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण प्रशासन की गहरी बीमारी है। जब पंचायत भवन और राशन दुकान जैसे बुनियादी ढांचे ही सुरक्षित नहीं, तो आम जनता की सुरक्षा और सुविधाओं की उम्मीद कैसे की जा सकती है। धौरासांड की यह स्थिति सीधा सवाल है क्या यही है सरकार का “विकास मॉडल”, जहाँ गाँव की सरकार खुद खंडहर में बैठी है।
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