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जशपुर । नागलोक क्षेत्र के फरसाबहार, पंडरीपानी, तपकरा, लवाकेरा, गंजहियाडीह, बारों, पमशाला, सहित सिंगीबहार में जीवित पुत्रिका पूजन की परंपरा आस्था, मातृप्रेम और वर्षों पुरानी पारिवारिक विरासत का प्रतीक बनी हुई है। बताया जाता है कि, वर्षों से लगातार जीवित पुत्रिका पूजन की परंपरा निभाई जा रही है। समय के साथ यह परंपरा केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रही, बल्कि आज क्षेत्र के दर्जनों स्थानों पर श्रद्धा और विधि-विधान के साथ जीवित पुत्रिका की पूजा की जाती है।
लोककथा में छिपी है संतान की लंबी उम्र की कामना
स्थानीय मान्यता और प्रचलित कथा के अनुसार, जीवित पुत्रिका व्रत माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है। कथा में ऐसी मातृभक्ति का वर्णन मिलता है, जहां कठिन परिस्थितियों के बावजूद मां अपनी संतान की रक्षा और उसके दीर्घ जीवन के लिए अटूट आस्था के साथ व्रत करती है। इसी मान्यता के कारण जीवित पुत्रिका पूजन को संतान के प्रति मां के त्याग, प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
कहा जाता है कि लंबे समय से चली आ रही इस लोक आस्था की परंपरा को गंझु परिवार ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभालकर रखा। परिवार के बुजुर्गों से नई पीढ़ी तक पहुंची पूजा की परंपरा आज 81 वर्ष पूरे करने के बाद भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ आगे बढ़ रही है।
एक घर से शुरू हुई परंपरा, आज दर्जनों जगहों पर आस्था का केंद्र
यह परंपरा अब क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनती जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार आज नागलोक क्षेत्र में दर्जनों स्थानों पर जीवित पुत्रिका की प्रतिमाएं विराजमान हैं, जहां महिलाएं श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करती हैं और संतान की दीर्घायु की कामना करती हैं।
पूजन के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाज, कथा श्रवण और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व रहता है। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से एकत्रित होकर पूजा करती हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
विरासत बनी नई पीढ़ी के लिए मिसाल
आज जब आधुनिकता के दौर में कई पुरानी लोक परंपराएं धीरे-धीरे सिमट रही हैं, ऐसे समय में सिंगीबहार के गंझु परिवार द्वारा दशकों से इस परंपरा को जीवित रखना अपने आप में खास है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि परिवार की पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक विरासत भी है।
परंपरा बताती है कि, आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं होती, बल्कि जब उसे पीढ़ियां संभालती हैं तो वह समाज की पहचान और इतिहास का हिस्सा बन जाती है। जीवित पुत्रिका पूजन आज इसी जीवंत परंपरा और मातृशक्ति की आस्था की एक अनूठी तस्वीर पेश कर रहा है।
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