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उग्रवाद और परमाणु जोखिम: क्या पाकिस्तान एशिया में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है?

उग्रवाद और परमाणु जोखिम: क्या पाकिस्तान एशिया में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है?

इक्कीसवीं सदी में वैश्विक भू-राजनीति में एक मूलभूत परिवर्तन देखने को मिला है, जिसमें सामरिक शक्ति का केंद्र अटलांटिक से हटकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो गया है। एशिया के आर्थिक उत्थान के साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ है कि विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती परमाणु शक्तियाँ ऐसे क्षेत्र में केंद्रित हो गई हैं जहाँ सीमा विवाद, वैचारिक प्रतिद्वंद्विता, आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद मौजूद हैं।
लेबनानी पत्रकार एवं लेखक रेने नाबा द्वारा लिखित अध्ययन The Nuclearization of Asia: From Nuclearization to Asia’s Rise इस संदर्भ में गंभीर चेतावनी प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन नीति-निर्माताओं से आग्रह करता है कि वे केवल सैन्य शक्ति या परमाणु संतुलन पर ही नहीं, बल्कि उन सामाजिक और वैचारिक कारकों पर भी ध्यान दें जो परमाणु सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।

यह अध्ययन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के जिनेवा सत्र के दौरान प्रस्तुत किया गया था। लेखक का तर्क है कि एशिया के परमाणु भविष्य को केवल सैन्य सिद्धांतों या तकनीकी क्षमताओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता। धार्मिक उग्रवाद, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तथा वैश्विक हथियार नियंत्रण व्यवस्था का कमजोर होना वर्तमान समय की सबसे गंभीर चुनौतियाँ हैं।

आज एशिया में चीन, भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया सहित कई परमाणु शक्तियाँ मौजूद हैं। चीन अपने परमाणु शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रहा है, भारत विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत कर रहा है, पाकिस्तान सामरिक परमाणु हथियारों का विस्तार कर रहा है तथा उत्तर कोरिया अपनी मिसाइल क्षमता बढ़ा रहा है। इसके साथ ही अमेरिका और रूस भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
शीत युद्ध के अपेक्षाकृत स्थिर द्विध्रुवीय परमाणु ढाँचे के विपरीत, एशिया का सामरिक वातावरण कहीं अधिक जटिल है। भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन, चीन-ताइवान, उत्तर एवं दक्षिण कोरिया तथा अमेरिका-चीन जैसी अनेक प्रतिस्पर्धाएँ एक साथ चल रही हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी क्षेत्रीय संकट के व्यापक परमाणु टकराव में बदलने की आशंका बनी रहती है।

उग्रवाद और पाकिस्तान
पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें उग्रवाद को परमाणु सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पारंपरिक परमाणु प्रतिरोधक सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि राज्य विवेकपूर्ण निर्णय लेते हैं और उनकी संस्थाएँ अनुशासित होती हैं। किंतु उग्रवाद इस व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।

लेखक के अनुसार, चरमपंथी विचारधाराएँ संस्थागत सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकती हैं, आंतरिक खतरे उत्पन्न कर सकती हैं तथा संकट की स्थिति में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। इसी संदर्भ में पुस्तक पाकिस्तान पर विशेष ध्यान देती है। लेखक का मत है कि दशकों से सक्रिय उग्रवादी नेटवर्क, वैचारिक कट्टरता तथा क्षेत्रीय संघर्षों ने ऐसे जोखिम उत्पन्न किए हैं जिन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
पुस्तक में उल्लेख है कि जनरल ज़िया-उल-हक़ के शासनकाल में आईएसआई के माध्यम से विकसित किए गए उग्रवादी नेटवर्कों ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के भीतर भी दीर्घकालिक चुनौतियाँ पैदा कीं। लेखक जनरल अख्तर अब्दुर रहमान तथा जनरल फैज़ हमीद जैसे व्यक्तियों का उदाहरण देते हुए इस प्रवृत्ति की चर्चा करते हैं। साथ ही, कश्मीर, खालिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान से जुड़ी नीतियों को भी पाकिस्तान की दीर्घकालिक अस्थिरता का कारण बताया गया है।

पाकिस्तान से आगे
पुस्तक यह भी प्रश्न उठाती है कि क्या यह समस्या केवल पाकिस्तान तक सीमित है या पूरे एशिया में फैल चुकी है। लेखक के अनुसार धार्मिक उग्रवाद, अतिराष्ट्रवाद, जातीय हिंसा, डिजिटल दुष्प्रचार और राजनीतिक ध्रुवीकरण अब पूरे क्षेत्र की सामान्य प्रवृत्तियाँ बनती जा रही हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर युद्ध, स्वायत्त हथियार और दुष्प्रचार जैसी नई तकनीकों ने भविष्य के संकटों को और अधिक जटिल बना दिया है। ऐसे वातावरण में परमाणु प्रतिरोध केवल मिसाइलों या पनडुब्बियों पर निर्भर नहीं रह सकता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं, जिम्मेदार मीडिया, सक्षम खुफिया तंत्र और सामाजिक एकता पर भी समान रूप से निर्भर करता है।
लेखक दक्षिण एशिया को विश्व के सबसे अस्थिर परमाणु क्षेत्रों में से एक बताते हैं। कारगिल से लेकर बालाकोट तक के सैन्य संघर्ष यह दर्शाते हैं कि दो परमाणु शक्तियों के बीच सीमित संघर्ष भी शीघ्र ही व्यापक संकट का रूप ले सकता है। गैर-राज्य उग्रवादी संगठनों की मौजूदगी इस जोखिम को और बढ़ा देती है।

रणनीतिक
लेखक का मुख्य संदेश है कि परमाणु सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। मिसाइल रक्षा प्रणाली, कमांड एवं कंट्रोल व्यवस्था तथा रणनीतिक प्रतिरोध आवश्यक हैं, किंतु स्थायी सुरक्षा के लिए शिक्षा सुधार, अंतरधार्मिक संवाद, सुशासन, आर्थिक अवसर और उग्रवाद-रोधी नीतियाँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

जिनेवा में हुई चर्चाओं में यह चिंता व्यक्त की गई कि वर्तमान वैश्विक हथियार नियंत्रण व्यवस्था कमजोर होती जा रही है तथा नई तकनीकी प्रतिस्पर्धाएँ रणनीतिक स्थिरता को चुनौती दे रही हैं। इसलिए परमाणु शासन को मजबूत करने, क्षेत्रीय विश्वास निर्माण उपायों को बढ़ावा देने तथा संकट संचार तंत्र को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है।
लेखक के अनुसार सबसे बड़ा खतरा तब उत्पन्न होगा जब परमाणु क्षमता उग्रवादी समूहों के हाथ लग जाए या चरमपंथी तत्व परमाणु कमांड एवं कंट्रोल प्रणाली में प्रवेश कर जाएँ। दस्तावेज़ में पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व की भी आलोचनात्मक चर्चा की गई है और आरोप लगाया गया है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई तथा कुछ उग्रवादी संगठनों के प्रति अलग-अलग नीति अपनाने से क्षेत्रीय सुरक्षा जोखिम बढ़ते हैं।

निष्कर्ष
लेख के अनुसार एशिया का वैश्विक राजनीति के केंद्र के रूप में उभरना आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर प्रदान करता है, लेकिन इसके साथ ही गंभीर रणनीतिक जोखिम भी उत्पन्न हुए हैं। लेखक का निष्कर्ष है कि परमाणु युग में वास्तविक सुरक्षा केवल प्रतिरोधक क्षमता से नहीं, बल्कि जिम्मेदार नेतृत्व, मजबूत संस्थाओं और शांति के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से सुनिश्चित की जा सकती है।

 

लेखक :- निर्मल कुमार निजी विचार

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Mukesh Nayak

Editer - Mukesh Nayak Jashpur (Cg) www.mukeshnk60@gmail.com

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