
ऐतिहासिक फैसला: जशपुर कलेक्टर ने पहाड़ी कोरवा की 70 साल पुरानी जमीन वापसी का दिया आदेश
जशपुर, छत्तीसगढ़। आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर जशपुर कलेक्टर न्यायालय ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। कलेक्टर रोहित व्यास ने 1955 में पहाड़ी कोरवा (विशेष पिछड़ी जनजाति) की जमीन के अवैध हस्तांतरण को ‘शून्य’ (Void) घोषित करते हुए, उसे वापस मूल भू-स्वामी के उत्तराधिकारियों के नाम दर्ज करने का आदेश जारी किया है।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने स्पष्ट कर दिया है कि ‘आदिवासी से आदिवासी’ के बीच हुआ जमीन का लेनदेन भी छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) के दायरे में आता है, यदि उसमें नियमों का पालन न किया गया हो।
क्या था पूरा मामला?
मामला ग्राम करदनापाठ, तहसील मनोरा का है। अपीलार्थी भन्जू (पहाड़ी कोरवा) ने शिकायत की थी कि उनके पूर्वजों की लगभग 31.31 एकड़ भूमि को वर्ष 1955 में धोखाधड़ी और छल-कपट के माध्यम से विपक्षी (ईसाई उरांव समाज के व्यक्ति) के पूर्वजों द्वारा अपने नाम करा लिया गया था।
पूर्व में अनुविभागीय अधिकारी (SDO) ने यह तर्क देते हुए आवेदन निरस्त कर दिया था कि यह मामला 1959 (भू-राजस्व संहिता लागू होने) से पहले का है और दोनों पक्ष आदिवासी श्रेणी के हैं। इस आदेश के विरुद्ध भन्जू ने कलेक्टर न्यायालय में अपील दायर की थी।अधिवक्ता सत्यप्रकाश तिवारी ने प्रकरण में कोरवा जनजाति की ओर से पैरवी की।
कलेक्टर न्यायालय के फैसले की 5 मुख्य बातें
न्यायालय ने सूक्ष्मता से दस्तावेजों का अध्ययन कर निम्नलिखित ऐतिहासिक निष्कर्ष निकाले:
धारा 170(ख) की व्यापकता: न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 170(ख) में प्रयुक्त शब्द “प्रत्येक ऐसा व्यक्ति” और “कोई भी व्यक्ति” का अर्थ है कि आदिवासी क्रेता के लिए भी यह नियम लागू होता है। यदि हस्तांतरण कपटपूर्ण है, तो उसे संरक्षण नहीं मिलेगा।
1959 के पूर्व के लेनदेन पर भी शिकंजा:
न्यायालय ने पाया कि 1959 की संहिता लागू होने से पहले भी मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1954 प्रभावी थी। उसकी धारा 152 और 153 के तहत, जमीन हस्तांतरण के 2 साल के भीतर सक्षम अधिकारी (उपायुक्त) को सूचना देना अनिवार्य था, जो इस मामले में नहीं दी गई थी।
अनुमति का अभाव: आदिम जनजाति की भूमि क्रय करने हेतु तत्कालीन कलेक्टर या अधिकृत अधिकारी से विधिवत अनुमति नहीं ली गई थी, जिससे यह विक्रय पत्र (बैनामा) अवैध हो गया।
लगातार कब्जा: न्यायालय ने माना कि जमीन पर आज भी अपीलार्थी (पहाड़ी कोरवा) का ही भौतिक कब्जा चला आ रहा है और वे कृषि कार्य कर रहे हैं। विपक्षियों ने केवल कागजों पर धोखाधड़ी से नाम दर्ज कराया था।
बैनामा ‘शून्य’ घोषित: कलेक्टर ने 28 अप्रैल 1955 को निष्पादित रजिस्ट्री को ‘अकृत एवं शून्य’ घोषित कर दिया।
प्रदेश के लिए क्यों है यह ‘नजीर’?
अक्सर यह माना जाता था कि 1959 से पहले के पुराने मामलों को धारा 170(ख) के तहत नहीं खोला जा सकता। साथ ही, आदिवासी द्वारा आदिवासी की जमीन खरीदने पर जांच की गुंजाइश कम मानी जाती थी। लेकिन इस फैसले ने स्थापित कर दिया है कि:
यदि विक्रेता ‘विशेष पिछड़ी जनजाति’ (जैसे पहाड़ी कोरवा) से है, तो नियमों का उल्लंघन होने पर दशक पुराने मामले भी निरस्त किए जा सकते हैं।
यह आदेश उन भू-माफियाओं और लोगों के लिए चेतावनी है जिन्होंने पूर्व में भोले-भाले आदिवासियों की जमीनों को नियमों को दरकिनार कर कब्जाया था।
न्यायालय का अंतिम आदेश
कलेक्टर जशपुर ने अनुविभागीय अधिकारी के पुराने आदेश को निरस्त करते हुए, विवादित भूमि को मूल भू-स्वामी या उनके विधिक वारिसों (भन्जू एवं अन्य) के नाम पर राजस्व अभिलेखों में अद्यतन (Mutation) करने का सख्त निर्देश दिया है।
अधिवक्ता सत्यप्रकाश तिवारी ने बताया कि धर्मांतरित लोगों के द्वारा आदिवासियों की जमीन कपटपूर्ण तरीके से जमीन खरीदी किए जाने पर कलेक्टर रोहित व्यास का यह फैसला नजीर बन गया है । इस फैसले को छत्तीसगढ़ में जल, जंगल और जमीन की लड़ाई में आदिवासियों की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
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