
Success Story : 39 साल पहले हिमालय की ऊँचाइयों को छूने वाले अधिकारी,आज शिक्षा और समाज सेवा में नई मिसाल…पढ़ें पूरी खबर
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जशपुर। जिला प्रशासनिक ढांचे में कार्यरत एक अधिकारी की यह प्रेरक कहानी साहस, सादगी और सेवा भाव का अनूठा उदाहरण है। वर्ष 1986 में मनाली स्थित ‘फ्रेंडशिप पीक’ (Friendship Peak) पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर अपनी क्षमता साबित करने वाले जुल्फिकार सिद्दीकी आज शिक्षा जगत में नए आयाम गढ़ रहे हैं। शांत स्वभाव, सरल व्यक्तित्व और कर्तव्यनिष्ठा के लिए
पहचाने जाने वाले सिद्दीकी साहब वर्तमान में डाइट प्राचार्य जशपुर के पद पर कार्यरत हैं। करीब चार दशक पहले, जब जशपुर रायगढ़ जिले का हिस्सा हुआ करता था और यह पूरा क्षेत्र मध्यप्रदेश राज्य के अंतर्गत आता था, उस समय संसाधनों और साधनों की भारी कमी के बावजूद जुल्फिकार सिद्दीकी हिमालय अभियान में शामिल हुए। कठोर परिस्थितियों में विशेष प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने मनाली की ‘फ्रेंडशिप पीक’ पर विजय हासिल की और उसी दिन उन्हें उपलब्धि का प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया।
फ्रेंडशिप पीक का यह नाम सोवियत संघ और भारत की दोस्ती के प्रतीक के रूप में रखा गया था। तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाच्योफ़ और भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की ऐतिहासिक मित्रता के सम्मान में इस पर्वत को ‘फ्रेंडशिप पीक’ कहा गया। उस दौर में ऊँचाइयों तक पहुंचना एक असंभव सपना माना जाता था, लेकिन उनके साहस और अनुशासन ने यह साबित किया कि इच्छाशक्ति से हर चुनौती को पार किया जा सकता है। अपने प्रशासनिक करियर में वे मनोरा, कुनकुरी और जशपुर में विकासखंड शिक्षा अधिकारी एवं जिला शिक्षा अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी प्रतिबद्धता सिर्फ दफ्तर की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उठाते रहे हैं। कई ऐसे छात्र-छात्राएं हैं जिनकी फीस, किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य शैक्षणिक जरूरतों की पूर्ति उन्होंने अपनी व्यक्तिगत आय से की है। लोग उन्हें एक ऐसे अधिकारी के रूप में जानते हैं जो प्रचार से दूर रहकर भी समाज में अमिट छाप छोड़ते हैं। उनकी सादगी, ईमानदारी और संवेदनशीलता ने उन्हें जिले में एक आदर्श व्यक्तित्व बना दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जुल्फिकार सिद्दीकी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि ऊँचाइयों को छूने के लिए केवल पद और साधन ही नहीं, बल्कि समर्पण और साहस की आवश्यकता होती है। चाहे हिमालय की चोटियों का रोमांच हो या शिक्षा जगत की चुनौतियाँ, उन्होंने हर परीक्षा को सफलता में बदलकर यह संदेश दिया है कि सच्ची सेवा और समर्पण कभी प्रचार की मोहताज नहीं होते।
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