
CG Mirror News
जशपुर। जिले के ग्राम पंचायत दुलदुला में “मोहन घर से बजरंग घर तक नाली निर्माण कार्य” को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों ने कलेक्टर जशपुर को सामूहिक शिकायत सौंपकर आरोप लगाया है कि बिना नया निर्माण कराए लगभग 2 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया। शिकायत में दावा किया गया है कि यह राशि उपसरपंच रमेश चंद्र गुप्ता के खाते में ट्रांसफर की गई। वहीं, पुरानी नाली की तस्वीरें अपलोड कर कथित रूप से फर्जी जियो-टैगिंग के जरिए भुगतान लेने का आरोप भी लगाया गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिस नाली को पोर्टल पर नए निर्माण के रूप में अपलोड किया गया है, उसके फोटो ही कई सवाल खड़े करते हैं। शिकायतकर्ताओं के अनुसार तस्वीरों में नाली के भीतर घास उगी हुई साफ दिखाई दे रही है, जबकि दीवारों पर काई जमी हुई नजर आती है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि नाली का निर्माण हाल ही में हुआ होता, तो उसमें इस तरह घास और काई का होना संभव नहीं लगता। इसी आधार पर उन्हें संदेह है कि वर्षों पुरानी नाली की तस्वीरों को नए निर्माण के रूप में अपलोड किया गया।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि मौके पर आज तक कोई नया नाली निर्माण दिखाई नहीं देता। ग्रामीणों के अनुसार जिस कार्य का भुगतान दर्शाया गया है, वहां पहले से बनी पुरानी नाली ही मौजूद है, जिसे नया कार्य बताकर शासकीय राशि का भुगतान कराया गया।
ग्रामीणों ने आवेदन के साथ पोर्टल के स्क्रीनशॉट, भुगतान विवरण और वास्तविक स्थल के फोटो भी प्रशासन को सौंपे हैं। उन्होंने मांग की है कि अपलोड किए गए फोटो और जियो-टैगिंग की तकनीकी जांच कराई जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि तस्वीरें वास्तव में नए निर्माण की हैं या पुरानी नाली की।
तकनीकी अधिकारियों पर भी उठ रहे गंभीर सवाल
इस मामले ने केवल पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका ही नहीं, बल्कि संबंधित एसडीओ, उपयंत्री (इंजीनियर), तकनीकी अमले और जनपद पंचायत के सीईओ की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी भी निर्माण कार्य का स्थलीय सत्यापन, तकनीकी मूल्यांकन और दस्तावेजों की जांच के बाद ही भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
ऐसे में यदि मौके पर निर्माण नहीं हुआ और फिर भी भुगतान हो गया, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या तकनीकी निरीक्षण वास्तव में किया गया था? क्या बिना भौतिक सत्यापन के मूल्यांकन और भुगतान की अनुमति दे दी गई? या फिर जांच प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरती गई?
ग्रामीणों ने मांग की है कि केवल पंचायत प्रतिनिधियों ही नहीं, बल्कि भुगतान प्रक्रिया से जुड़े सभी जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। साथ ही यदि फर्जी जियो-टैगिंग, पुरानी नाली की फोटो अपलोड कर भुगतान लेने और दस्तावेजों में हेराफेरी की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों से शासकीय राशि की वसूली कर कानूनी कार्रवाई की जाए।
अब यह मामला प्रशासन के सामने बड़ी परीक्षा बन गया है। यदि जांच में शिकायत सही पाई जाती है, तो यह सिर्फ एक पंचायत का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी और तकनीकी सत्यापन व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा करेगा।
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