
CG Mirror News कुनकुरी। आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री 108 आराध्य सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री 105 श्रेय सागर जी महाराज का आज कुनकुरी नगर में ससंघ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। पूरे नगर में जैन समाज सहित श्रद्धालुओं में अपार उत्साह और भक्तिभाव देखने को मिला। नगर के प्रमुख मार्गों पर पुष्पवर्षा, मंगल कलश और जयकारों के साथ मुनिराज का स्वागत किया गया। मुनि श्री नंदगांव (महाराष्ट्र) में चातुर्मास पूर्ण करने के पश्चात इंदौर होते हुए छत्तीसगढ़ के राजिम पहुंचे थे,
जहां पंकल्यानक महोत्सव संपन्न कराया गया। इसके पश्चात बलौदाबाजार में भव्य पंचकल्यानक आयोजन कराकर समाज को धर्म, संयम और आत्मकल्याण का संदेश दिया। अब कुनकुरी से होते हुए महाराज श्री ससंघ का पदविहार जैनों के सर्वोच्च तीर्थ सम्मेद शिखरजी (झारखंड) की ओर अग्रसर है।मु नि श्री 108 आराध्य सागर जी महाराज छत्तीसगढ़ के लिए विशेष गौरव का विषय हैं। इनका जन्म दुर्ग जिले में हुआ। लगभग 15 वर्ष पूर्व सांसारिक जीवन से विरक्ति लेकर इन्होंने वैराग्य धारण किया और गृह त्याग कर आत्मकल्याण के मार्ग पर निकल पड़े। भगवान आदिनाथ द्वारा बताए गए अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और तपस्या के मार्ग को अपनाकर आज वे हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। मुनि श्री का जीवन त्याग, संयम और साधना का प्रतीक है। उनका संपूर्ण जीवन पैदल पदविहार, अल्पाहार, मौन साधना और धर्म प्रचार में समर्पित है। वे जहां भी जाते हैं, वहां समाज में नशामुक्ति, नैतिकता, संस्कार और आध्यात्मिक जागरण का संदेश फैलाते हैं। युवाओं में उनके प्रवचनों का विशेष प्रभाव देखा जा रहा है, जिससे कई लोग गलत मार्ग छोड़कर संयम और धर्म के रास्ते पर चलने लगे हैं।
कुनकुरी आगमन पर जैन समाज ने विशेष धर्मसभा का आयोजन किया, जिसमें मुनि श्री ने कहा कि “मनुष्य जीवन दुर्लभ है, इसे भोग में नहीं बल्कि योग और त्याग में लगाना ही सच्चा पुरुषार्थ है।” उन्होंने बताया कि सच्ची पूजा मंदिर में नहीं, बल्कि अपने आचरण में होती है। जब तक विचार शुद्ध नहीं होंगे, तब तक जीवन में शांति संभव नहीं है।
क्षुल्लक श्री 105 श्रेय सागर जी महाराज भी ससंघ के साथ साधना पथ पर अग्रसर हैं और युवाओं को संयम, ब्रह्मचर्य और आत्मअनुशासन का महत्व समझा रहे हैं। दोनों मुनिराजों की तपस्या और साधना को देखकर श्रद्धालुओं में गहरी श्रद्धा और भावुकता देखी गई। मुनि श्री 108 आराध्य सागर जी महाराज आज न केवल जैन समाज बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ के लिए गौरव बन चुके हैं। दुर्ग की धरती से निकलकर उनका सम्मेद शिखरजी की ओर पदविहार करना इस बात का प्रतीक है कि त्याग और तपस्या से व्यक्ति न केवल स्वयं का बल्कि पूरे समाज का मार्गदर्शन कर सकता है। उनके चरण जहां पड़ते हैं, वहां धर्म की ध्वजा स्वतः लहराने लगती है।
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