
CG Mirror News
कुनकुरी नगर पंचायत में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने वाला एक गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जयस्तम्भ चौक सहित नगर के लगभग सभी प्रमुख चौक-चौराहों पर लगाए गए सीसीटीवी कैमरे पिछले एक साल से अधिक समय से बंद पड़े हैं। जिस सिस्टम को जनता की सुरक्षा और अपराध पर नियंत्रण के लिए लगाया गया था, वही आज खुद सिस्टम की लापरवाही का प्रतीक बनकर हवा में झूल रहा है। सबसे हैरानी की बात यह है कि कुनकुरी कोई सामान्य क्षेत्र नहीं बल्कि VIP विधानसभा क्षेत्र है और यही मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र भी है।
इसके बावजूद यहां की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि “डिजिटल निगरानी” नाम की चीज़ केवल कागजों और बोर्डों तक ही सीमित रह गई है।
जयस्तम्भ चौक, बस स्टैंड, साप्ताहिक बाजार, अस्पताल रोड, स्कूल रोड और मुख्य मार्ग जैसे अत्यधिक भीड़भाड़ वाले इलाकों में रोज़ाना हजारों लोग आवाजाही करते हैं। महिलाएं, बच्चे, व्यापारी और बुजुर्ग हर दिन इसी रास्ते से गुजरते हैं। इन इलाकों में छोटे-बड़े विवाद, चोरी, सड़क दुर्घटना और असामाजिक गतिविधियों की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं, लेकिन जब किसी घटना की जांच की बात आती है तो सबसे आम जवाब मिलता है “फुटेज उपलब्ध नहीं है, कैमरा बंद है।”
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई कैमरे महीनों से खराब हैं, कुछ कैमरों की दिशा सड़क की बजाय आसमान या दीवार की तरफ हो चुकी है, तो कई कैमरों के तार ही कटे हुए हैं। कई जगह कैमरे केवल दिखावे के लिए लगे हैं, जिनमें न बिजली है, न रिकॉर्डिंग और न ही कोई मॉनिटरिंग सिस्टम।
नगर पंचायत और प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। नागरिकों का आरोप है कि कई बार शिकायत देने के बावजूद सिर्फ आश्वासन दिए गए, लेकिन न तो किसी तकनीकी टीम को भेजा गया और न ही सिस्टम की मरम्मत कराई गई। ऐसा लगता है मानो यह पूरा CCTV प्रोजेक्ट सिर्फ उद्घाटन और फोटो खिंचवाने तक ही सीमित था। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रोज़ इसी मार्ग से उच्च अधिकारी, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अमला गुजरता है, तो किसी की नजर इन लटकते, टूटे और बंद पड़े कैमरों पर क्यों नहीं पड़ती? क्या सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी केवल कागजी रिपोर्ट तक सीमित है।
विशेषज्ञों के अनुसार, CCTV सिस्टम तभी प्रभावी होता है जब उसके साथ सक्रिय कंट्रोल रूम, प्रशिक्षित स्टाफ और नियमित मेंटेनेंस हो। लेकिन कुनकुरी में न कोई सक्रिय कंट्रोल रूम है और न ही कोई जिम्मेदार अधिकारी तय किया गया है जो पूरे सिस्टम की निगरानी करे।
इस लापरवाही का सीधा फायदा असामाजिक तत्वों को मिल रहा है। जब अपराधियों को यह पता है कि कैमरे काम नहीं कर रहे, तो उनका मनोबल बढ़ जाता है और वे बेखौफ होकर घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। VIP विधानसभा में इस तरह की स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक विफलता है, बल्कि जनता की सुरक्षा से खुला खिलवाड़ भी है। अब सवाल यह है कि क्या इस गंभीर चूक पर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी या फिर हवा में लटकते कैमरे यूं ही सिस्टम का मज़ाक बनते रहेंगे।
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