
सफलता की कहानी :
जशपुर की अनूठी धरोहर: छिंद-कांसा की टोकरी, आत्मनिर्भरता की मिसाल..
जशपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सुशासन में जशपुर जिले की महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का सपना साकार हो रहा है। जिले के आदिवासी बाहुल्य अंचल कांसाबेल विकासखंड की कोटानपानी ग्राम पंचायत की करीब 100 महिलाएं आज छिंद और कांसा घास से बनी आकर्षक टोकरी तैयार कर रही हैं। यह न केवल एक कला है, बल्कि आज उनकी आजीविका का मजबूत आधार भी बन चुका है।
छिंद और कांसा घास से बनी ये टोकरी एवं अन्य उत्पाद टिकाऊ, सुंदर और सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक हैं। इस अनोखे हस्तशिल्प की मांग जिले से लेकर देश के कोने-कोने तक बनी हुई है। जशपुर की ‘जशप्योर’ ब्रांड के तहत इन टोकरियों की पहचान देशभर में फैल रही है।
🌿 तीन दशकों की यात्रा, मन्मति की प्रेरणा
कोटानपानी की महिलाओं की यह यात्रा 30 साल पहले एक किशोरी मन्मति से शुरू हुई। मन्मति ने अपनी नानी के गांव, पगुराबहार (फरसाबहार विकासखंड) में यह शिल्प सीखा। वहाँ चटाई बनाने की परंपरा तो थी, पर मन्मति ने कांसा घास के साथ छिंद को जोड़कर टोकरी बनाना सीखा। लौटकर कोटानपानी में इस शिल्प को फैलाया। पहले अपने उपयोग के लिए और फिर आसपास की महिलाओं को सिखाकर यह हुनर गाँव-गाँव फैल गया।
💪 सरकारी सहयोग से उड़ान
वर्ष 2017 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत बिहान समूह बने। तीन समूह – हरियाली, ज्ञान गंगा और गीता – इस कार्य से जुड़े। बाद में छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प बोर्ड ने 12 महिलाओं को प्रशिक्षित किया और बाजार की पहुँच उपलब्ध कराई। अब 15 समूहों की 100 से अधिक महिलाएं इस उद्योग में लगी हुई हैं।
🌟 लखपति दीदियों की कहानी
कोटानपानी की ये मेहनती महिलाएं अब लखपति दीदियाँ बन चुकी हैं। मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन की मदद से न सिर्फ स्थानीय बाज़ारों में, बल्कि मेलों और प्रदर्शनी के ज़रिए राष्ट्रीय पहचान भी बनी।
लक्ष्मी पैंकरा, रिंकी यादव जैसे चेहरे बिहान मेला में भी अपने हुनर की चमक बिखेर चुके हैं।
🪴 कला और संस्कृति का संगम
यह टोकरी न सिर्फ फल और पूजा सामग्री रखने के लिए, बल्कि उपहार के रूप में भी बेहद लोकप्रिय है। जशपुर के आदिवासी समाज में विवाह, देवता पूजन और छठ पूजा जैसे आयोजनों में इसका विशेष महत्व है।
🌾 कच्चे माल का विशेष महत्व
- छिंद: खजूर के पेड़ की पत्तियां। 12 महीने उपलब्ध, हर 3 महीने में कटाई।
- कांसा घास: कम वर्षा वाले इलाकों में जून से अगस्त के बीच कटाई।
- महिलाओं द्वारा समय रहते छिंद और कांसा की पत्तियों को सुरक्षित कर लिया जाता है।
- छिंद-कांसा प्रति किलो ₹150 में खरीदा भी जाता है।
💬 कोटानपानी की दीदियों की आवाज़
महिलाओं ने बताया:
“कांसा घास को बेलनाकार आकार देकर उसे छिंद की पत्तियों से लपेटते हैं। इससे टोकरी को गोलनुमा मजबूती और आकर्षक रूप मिलता है। सावन-भादो के मौसम में कांसा घास तैयार हो जाता है – हमारे लिए यह एक अवसर का समय होता है।”
🌟 सम्मान और पहचान की ओर
छिंद-कांसा की ये टोकरी अब सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि ग्राम्य जीवन, परंपरा और आत्मनिर्भरता की कहानी बन चुकी है।
जिला प्रशासन और छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प बोर्ड की मदद से इस हस्तकला को और पहचान मिल रही है। आने वाले समय में इन मेहनतकश दीदियों को और सम्मान व पहचान दिलाने का लक्ष्य रखा गया है।
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